उत्तराखंड

मुख्य अतिथि के रूप में जनेश्वर पार्क में शामिल हुए कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद्र अग्रवाल



लखनऊ में इन दिनों, लोग सिर्फ जनेश्वर मिश्र पार्क की ओर बढ़ रहे हैं, जहां बच्चे, युवा, महिलाएं, और बुजुर्ग सभी शामिल हैं। यहां, सभी लोग महानाट्य जाणता राजा के माध्यम से छत्रपति शिवाजी के वीरता को करीब से देख रहे हैं। एक विशाल मंच, किला, हाथी, और पालकी के साथ, शनिवार से महानाट्य में दो हाथी भी शामिल हो गए हैं। छत्रपति शिवाजी की वीरता की कहानी को बखूबी प्रस्तुत किया जा रहा है, और यह सब जनेश्वर मिश्र पार्क के माध्यम से देखी जा सकती है। 250 कलाकारों की एकता के साथ कदम ताल, हाथियों की प्रहारों की आवाज़ें और तलवारों के सम्मान के साथ, यह एक आद्भुत प्रदर्शन है जो जनेश्वर मिश्र पार्क के माध्यम से देखा जा सकता है। इसलिए, इस नाटक को देखने वालों की भीड़ तीसरे दिन भी अत्यधिक थी।

दिव्य प्रेम सेवा मिशन की ओर से जाणता राजा महानाट्य के तीसरे दिन शिवाजी महाराज की वीरगाथा का कलाकारों ने बखूबी मंचन किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री प्रेमचंद्र अग्रवाल, राज्यमंत्री कुंवर बृजेश सिंह, दानिश आजाद, प्रमुख सचिव के. रवीन्द्र नायक, विशेष सचिव विधानसभा मुकुल साहू, पूर्व विधायक श्याम सुन्दर यादव, दिल्ली सरकार में पूर्व विशेष सचिव ओमकार राय, मुख्य कार्यक्रम संयोजक अमरजीत मिश्रा, अविनाश सिंह चौहान विधान परिषद सदस्य जितेन्द्र सिंह सेंगर, विधान परिषद सदस्य शिवशकर सिंह प्रदेष उपाध्यक्ष किसान मोर्चा, रेशु भाटिया आदि रहे।

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बहू-बेटियों और गाय के रक्षा का संकल्प

शिवाजी की भूमिका निभा रहे कलाकार ने कहा कि गायों की रक्षा सभी देवालयों की सुरक्षा, बहू-बेटियों की रक्षा और आम जनता में सुख-शान्ति व्याप्त हो, यही हिंदवी स्वराज्य का मूल मंत्र है। मंचन के दौरान शिवाजी ने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना तो कर दी, लेकिन स्वयं राज्य सिंहासन पर स्वर्ण मुकुट लगाकर राजा बनने के इच्छुक नहीं थे, लेकिन माता जीजाबाई ने कहा कि बचपन से मैने भगवान शिव और तुलजा भवानी से यही प्रार्थना की है कि एक दिन मेरा शिवा राजा बनकर गरीब और आम जनता की सेवा करता दिखाई दे, तभी हिंदवी स्वराज्य की स्थापना हो सकेगी। शिवाजी ने माता और गुरुजनों के बहुत कहने पर सिंहासन स्वीकार किया। शिवाजी ने स्वराज्य में आम जनता की सेवा के साथ बहू-बेटियों को भरपूर सम्मान दिलाने का कार्य किया और धर्म की स्थापना की।

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तीन घंटे में गौरवगाथा का मंचन

शिवाजी के जन्म से छत्रपति बनने तक की ऐतिहासिक गौरवगाथा को तीन घंटे के नाटक में समेटने का सफल प्रयास काबिले तारीफ है। चार मंजिला सेट, 250 से अधिक कलाकार, चकाचौंध करने वाली प्रकाश व्यवस्था, वेशभूषा, तोप, हाथी, घोड़े पर सवार सैनिकों और गीतों से सजे नाटक को पूरे तीन घंटे हजारों दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखते रहे। नाटक में कथ्य दर्शाने के लिए संवाद से अधिक गीत प्रयोग किए गए। सूत्रधार के जरिए भी घटनाएं स्पष्ट की गईं। रिकॉर्डेड संवाद, गीत और बैकग्राउंड म्यूजिक के बीच कलाकारों के लिप्स मूवमेंट की टाइमिंग कमाल की रही। मराठी नृत्य और मराठी गानों ने जाणता राजा के मंचन को शानदार बनाने का काम किया।

1985 में शुरू हुआ था मंचन

पुणे में 29 जुलाई 1922 को जन्मे इतिहासकार बाबा साहब पुरेंद्र ने मराठी भाषा में राजा शिवाजी छत्रपति किताब लिखी। इसमें शिवाजी के पूरे जीवन का सार है। उन्होंने भारत के हर उस किले का दौरा किया, जहां शिवाजी कभी गए थे। शिवाजी के जीवन पर 1985 में जाणता राजा नाटक शुरू किया। भारत और विदेश में अभी तक 1200 बार इसका मंचन हो चुका है। उन्हें कालिदास सम्मान, महाराष्ट्र भूषण से नवाजा जा चुका है। करीब 96 साल की उम्र में भी वे नाटक पर काम करते रहते हैं।

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17वीं शताब्दी दर्शाई 

नाटक में 17वीं शताब्दी को दर्शाया गया है। 1627 से 1680 के बीच छत्रपति शिवाजी राजे भोसले ने शासन किया। नाटक में उन्हें कुशल प्रशासक और रणनीतिकार दिखाया गया है। वह उदार पंथनिरपेक्ष शासक थे। गुप्तचर प्रणाली के जरिए दुश्मन छावनी की टोह लेना उनकी खोज थी। अपने समय में उन्होंने पेड़ काटने पर रोक लगा दी थी। उन्हें भारतीय नौसेना का जनक एवं तकनीकविद् कहा जाता है। नाटक में शिवाजी के शासन काल को तीन घंटों में समेटने की कोशिश की गई है। महाराष्ट्र के लोक नृत्यों के जरिए नाटक को भव्यता प्रदान की गई।

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