उत्तराखंड

“गोल्डन मिनट” बचाएगा नवजातों की जिंदगी, हिम्स में स्वास्थ्यकर्मियों को मिला विशेष प्रशिक्षण

देहरादून। उत्तराखंड में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को कम करने और जन्म के तुरंत बाद आपात परिस्थितियों से प्रभावी ढंग से निपटने की दिशा में Himalayan Institute of Medical Sciences (हिम्स) जौलीग्रांट ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। बाल रोग एवं नवजात विज्ञान विभाग द्वारा राष्ट्रव्यापी नियोनेटल रिससिटेशन प्रोग्राम (एनआरपी) दिवस के अवसर पर आयोजित बेसिक एनआरपी प्रशिक्षण कार्यशाला में प्रदेशभर से आए लगभग 40 स्वास्थ्य पेशेवरों को नवजात पुनर्जीवन की आधुनिक एवं व्यवहारिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया।

कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि जन्म के बाद के शुरुआती 60 सेकंड, जिन्हें चिकित्सा विज्ञान में “गोल्डन मिनट” कहा जाता है, नवजात शिशु के जीवन के लिए अत्यंत निर्णायक होते हैं। इस दौरान यदि प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी समय रहते सही उपचार उपलब्ध करा दें, तो अनेक गंभीर परिस्थितियों में नवजात की जान बचाई जा सकती है।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. अशोक कुमार देवरारी ने कहा कि पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए प्रशिक्षित चिकित्सा कर्मियों की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्होंने कहा कि आधुनिक प्रशिक्षण से लैस डॉक्टर और नर्सें प्रसव के दौरान उत्पन्न जटिलताओं में नवजातों के जीवन की रक्षा करने में सक्षम बनेंगे।

वहीं डॉ. रुचिरा नौटियाल ने नवजात शिशुओं की सुरक्षित देखभाल के लिए स्त्री रोग विशेषज्ञों, बाल रोग विशेषज्ञों तथा नर्सिंग स्टाफ के बीच बेहतर समन्वय को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि समन्वित चिकित्सा प्रणाली ही मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी बना सकती है।

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कार्यशाला का आयोजन National Neonatology Forum की उत्तराखंड शाखा की पहल पर किया गया। कार्यक्रम में डॉ. अल्पा गुप्ता और डॉ. राकेश कुमार ने बताया कि इस अभियान को Indian Academy of Pediatrics, UNICEF, Federation of Obstetric and Gynaecological Societies of India तथा Trained Nurses Association of India का सहयोग प्राप्त है।

विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि उत्तराखंड में वर्तमान में प्रति एक हजार जीवित जन्मों पर 17 नवजात मृत्यु दर्ज की जा रही हैं, जिन्हें प्रभावी प्रशिक्षण, संसाधनों और त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप के माध्यम से एकल अंक तक लाया जा सकता है।

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कार्यशाला का नेतृत्व लीड इंस्ट्रक्टर डॉ. सनोबर वासिम ने किया, जबकि कोर्स कोऑर्डिनेटर डॉ. नीरुल पंडिता, डॉ. सोनम अग्रवाल और डॉ. नितिका ने प्रतिभागियों को नवजात पुनर्जीवन की तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रदान किया।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम लगातार आयोजित किए जाएं, तो राज्य में नवजात स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है और शिशु मृत्यु दर में प्रभावी कमी लाई जा सकती है।

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