“जब सिस्टम सोया,तब पूर्व पार्षद जागा: ऋषिकेश में ‘पते वाली परची’ से नशे के धंधे पर करारा व्यंग्य”
सूखी घोषित नगरी में ‘गीले धंधे’ की हकीकत उजागर, जनप्रतिनिधि की पहल बनी चर्चा का केंद्र
ऋषिकेश। कहते हैं, जब व्यवस्था की आँखों पर धूल जम जाए तो कोई न कोई आईना लेकर सामने आ ही जाता है। ऋषिकेश की गलियों में इन दिनों कुछ ऐसा ही आईना लेकर उतरे हैं स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं पूर्व पार्षद पंडित शिव कुमार गौतम, जिन्होंने अवैध नशे के कारोबार पर सीधे उंगली उठाने के बजाय ऐसा व्यंग्यात्मक प्रहार किया है कि चर्चा शहर से निकलकर सोच तक पहुँच गई है। उनकी इस मुहीम मे उनका साथ देने वाले स्थानीय दुकानदार दीपक कुमार हैं। जिन्होंने अपनी दुकान पर यह पते वाली पर्ची लगाई है।
तीर्थनगरी, जिसे कागज़ों में ‘ड्राई एरिया’ कहा जाता है, वहाँ गली-गली में नशे की उपलब्धता किसी रहस्य से कम नहीं। फर्क बस इतना है कि यह रहस्य अब रहस्य नहीं रहा—बल्कि एक खुली किताब बन चुका है। और इसी ‘खुली किताब’ के पन्नों पर अब पते भी लिख दिए गए हैं।
पूर्व पार्षद की पहल कुछ यूँ है कि जिन स्थानों पर कथित रूप से नशे का कारोबार फल-फूल रहा है, वहाँ पहचान की ‘परची’ चस्पा कर दी गई है। यह कोई सामान्य विरोध नहीं, बल्कि ऐसा व्यंग्य है जो सीधे दिल और दिमाग पर दस्तक देता है—बिना शोर मचाए, बिना कानून की सीमा लांघे।
शहर के जानकार बताते हैं कि वर्षों से इस अवैध धंधे के खिलाफ आवाज़ें उठती रही हैं, लेकिन नतीजे अक्सर फाइलों में ही सिमट जाते हैं। विरोध करने वालों को कभी कानूनी उलझनों का सामना करना पड़ा, तो कभी दबाव और डर का। ऐसे माहौल में यह पहल न सिर्फ साहसिक है, बल्कि एक संदेश भी देती है—कि अगर शब्दों में धार हो, तो तलवार की जरूरत नहीं पड़ती।
पंडित शिव कुमार गौतम का यह कदम कहीं न कहीं उस व्यवस्था पर सवालिया निशान भी है, जो सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनने की कला में निपुण हो चुकी है। बिना किसी आरोप-प्रत्यारोप के, बिना किसी नाम लिए, उन्होंने जो तरीका अपनाया है, वह एक तरह से ‘शब्दों का सटीक प्रहार’ है।
फिलहाल, शहर में इस पहल की खूब सराहना हो रही है। लोग इसे एक जागरूक जनप्रतिनिधि की संवेदनशील सोच और रचनात्मक विरोध का उदाहरण मान रहे हैं। अब देखना यह है कि यह ‘परची वाला व्यंग्य’ सिर्फ चर्चा बनकर रह जाता है या फिर सच में किसी बदलाव की शुरुआत करता है।
इतना तय है—इस बार खबर सिर्फ खबर नहीं, एक संदेश है… और संदेश भी ऐसा, जिसे समझने के लिए शोर नहीं, समझ चाहिए।



