उत्तराखंड

जब चिकित्सा ने संवेदना का हाथ थामा, हिम्स ने बचा ली एक बेटी की उम्मीद

डोईवाला /देहरादून। Himalayan Institute of Medical Sciences (हिम्स) जॉलीग्रांट ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि आधुनिक चिकित्सा केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि जीवन की संभावनाओं को बचाने की कला भी है। संस्थान के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग ने 26 वर्षीय महिला की बच्चेदानी को सुरक्षित रखते हुए अत्याधुनिक लेप्रोस्कोपिक “की-होल” सर्जरी सफलतापूर्वक कर चिकित्सा जगत में एक नई मिसाल कायम की है।

टिहरी गढ़वाल निवासी गीता देवी लंबे समय से यूटराइन प्रोलैप्स यानी बच्चेदानी बाहर आने की गंभीर समस्या से पीड़ित थीं। बीमारी ने उनके सामान्य जीवन को लगभग असहज बना दिया था। चलने-फिरने से लेकर दैनिक कार्यों तक हर कदम दर्द और परेशानी से भरा था। कई अस्पतालों में परामर्श के दौरान कम उम्र के बावजूद उन्हें हिस्टेरेक्टॉमी यानी बच्चेदानी निकालने की सलाह दी गई, लेकिन हिम्स ने इस चुनौती को केवल एक केस नहीं बल्कि एक युवा महिला के भविष्य से जुड़ा विषय माना।

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हिम्स की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ञा खुगसाल ने मरीज की आयु, शारीरिक स्थिति और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए बच्चेदानी को सुरक्षित रखने वाली आधुनिक लेप्रोस्कोपिक लैप सैक्रोहिस्टेरोपेक्सी तकनीक अपनाने का निर्णय लिया। 13 मई 2026 को दूरबीन विधि से हुई इस जटिल सर्जरी में विशेष मेश के माध्यम से बच्चेदानी को उसकी सामान्य स्थिति में स्थापित किया गया। साथ ही कमजोर हो चुकी मांसपेशियों और प्रभावित हिस्सों का भी सफल उपचार किया गया।

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सर्जरी की सफलता के पीछे विशेषज्ञों की समर्पित टीम का सामूहिक प्रयास रहा। डॉ. आकांक्षा देशवाली, डॉ. अंजली सोनकर और डॉ. निशिता ने सर्जिकल टीम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि एनेस्थीसिया विभाग से डॉ. कृति बिंदल और ममता ने सहयोग दिया। विभागाध्यक्ष डॉ. रुचिरा नौटियाल के मार्गदर्शन ने पूरी प्रक्रिया को नई दिशा और मजबूती प्रदान की।

डॉ. प्रज्ञा खुगसाल के अनुसार कम उम्र की महिलाओं में बच्चेदानी को सुरक्षित रखना केवल चिकित्सकीय आवश्यकता नहीं, बल्कि उनकी भविष्य की जीवन गुणवत्ता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय है। उन्होंने बताया कि की-होल तकनीक के जरिए मरीज को कम दर्द, कम रक्तस्राव, छोटा चीरा और तेजी से रिकवरी जैसे अनेक लाभ मिलते हैं।

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इस सफल सर्जरी का सबसे सकारात्मक पक्ष यह रहा कि मरीज ऑपरेशन के मात्र 24 घंटे के भीतर सामान्य रूप से चलने-फिरने लगीं और सामान्य भोजन भी लेने लगीं। उपचार के दौरान किसी प्रकार की जटिलता सामने नहीं आई। वर्तमान में मरीज पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्होंने हिम्स की पूरी चिकित्सकीय टीम के प्रति आभार व्यक्त किया है।

हिम्स जॉलीग्रांट की यह उपलब्धि केवल एक सफल सर्जरी नहीं, बल्कि आधुनिक चिकित्सा, मानवीय संवेदनाओं और चिकित्सकीय दूरदृष्टि का जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है।

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