उत्तराखंड

धर्म, ज्योतिष और राजनीति का संगम: दलीप रावत व आचार्य दैवज्ञ की मुलाकात बनी चर्चा का विषय

देहरादून। कभी-कभी कुछ मुलाकातें केवल औपचारिक नहीं होतीं, बल्कि अपने पीछे अनेक सवाल, संभावनाएं और चर्चाएं छोड़ जाती हैं। उत्तराखंड की सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि में ऐसी ही एक मुलाकात उस समय चर्चा का केंद्र बन गई, जब लैंसडाउन विधायक एवं सिद्धबली धाम के महंत दलीप रावत ने उत्तराखंड ज्योतिष रत्न आचार्य डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल “दैवज्ञ” से धर्मपुर स्थित उनके निजी आवास “व्हाइट हाउस” में भेंट की।

करीब एक घंटे तक चली इस एकांत वार्ता में केवल औपचारिकताओं का आदान-प्रदान नहीं हुआ, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, सनातन संस्कृति, साहित्य, शिक्षा, सामाजिक सरोकारों और क्षेत्रीय राजनीति जैसे विषयों पर गंभीर मंथन हुआ। बताया जाता है कि दोनों विद्वानों ने वर्तमान परिस्थितियों और भविष्य की संभावनाओं पर ज्योतिषीय एवं वैचारिक दृष्टिकोण से भी विचार-विमर्श किया।

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मुलाकात के दौरान विधायक दलीप रावत ने आचार्य दैवज्ञ को कोटद्वार स्थित सिद्धबली धाम आने का निमंत्रण भी दिया। यह आमंत्रण केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दो प्रभावशाली व्यक्तित्वों के बीच आत्मीय संबंधों की निरंतरता के रूप में भी देखा जा रहा है।

मुलाकात की पुष्टि करते हुए आचार्य डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल “दैवज्ञ” ने कहा कि उनका और दलीप रावत का संबंध आज का नहीं, बल्कि दशकों पुराना है। उन्होंने स्मरण करते हुए बताया कि जब वे सनातन धर्म प्रचारिणी सभा के माध्यम से देश-विदेश में श्रीमद्भागवत एवं सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करते थे और दलीप रावत सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते थे, तभी से दोनों के बीच आत्मीयता का सूत्र जुड़ा हुआ है। वर्ष 2000 में दलीप रावत के सिद्धबली धाम के महंत बनने के बाद यह संबंध और अधिक प्रगाढ़ होता चला गया।

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राजनीतिक और सामाजिक हलकों में इस मुलाकात को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि बातचीत के विषयों को लेकर दोनों पक्षों ने कोई विशेष टिप्पणी नहीं की है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति, धर्म और समाज में प्रभाव रखने वाले दो व्यक्तित्वों का एकांत संवाद स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा का विषय बन गया है।

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फिलहाल, इस मुलाकात के वास्तविक मायने चाहे जो हों, लेकिन इतना तय है कि जब धर्मपीठ का प्रभाव और ज्योतिषीय विद्वता एक ही छत के नीचे संवाद करती है, तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई देती है। यही कारण है कि देहरादून से लेकर गढ़वाल के राजनीतिक गलियारों तक इस मुलाकात की चर्चा थमने का नाम नहीं ले रही है।

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