उत्तराखंड

हिम्स में फेटल मेडिसिन का मंथन, मातृ-भ्रूण स्वास्थ्य के नए आयामों पर बनी दिशा

डोईवाला/देहरादून । चिकित्सा विज्ञान का उद्देश्य केवल रोगों का उपचार नहीं, बल्कि जीवन को उसके आरंभिक स्वरूप में सुरक्षित करना भी है। इसी सोच को केंद्र में रखते हुए हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (हिम्स), जौलीग्रांट में आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम एक ऐसे मंच के रूप में सामने आया, जहाँ विशेषज्ञों ने गर्भस्थ जीवन की सुरक्षा, आधुनिक तकनीकों और चिकित्सा की बदलती संभावनाओं पर गंभीर मंथन किया।

प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग तथा सोसाइटी ऑफ फेटल मेडिसिन (एसएफएम) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए विशेषज्ञों ने फेटल मेडिसिन के क्षेत्र में हो रहे बदलावों, उच्च जोखिम गर्भावस्था की चुनौतियों और प्रसवपूर्व देखभाल के नए मानकों पर विचार साझा किए।

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आदि कैलाश सभागार में दिनभर चले सत्रों में यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि मातृ एवं भ्रूण स्वास्थ्य केवल चिकित्सकीय विषय नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। विशेषज्ञों ने कहा कि आधुनिक जांच तकनीकों और समयबद्ध स्क्रीनिंग के माध्यम से गर्भस्थ शिशु से जुड़ी जटिलताओं की समय रहते पहचान कर बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

विशेषज्ञ डॉ. अशोक खुराना ने कहा कि फेटल मेडिसिन में तकनीकी उन्नति ने उपचार की संभावनाओं को पहले से कहीं अधिक व्यापक बनाया है। उनके अनुसार सटीक निदान और समय पर चिकित्सकीय हस्तक्षेप मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

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डॉ. कृष्ण गोपाल ने उच्च जोखिम गर्भावस्था के मामलों में बहुविषयक दृष्टिकोण और आधुनिक अल्ट्रासाउंड तकनीकों की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि चिकित्सा विज्ञान की प्रगति का वास्तविक लाभ तब है, जब वह मरीज तक समय पर और प्रभावी रूप में पहुंचे।

प्रसूति एवं स्त्री रोग विभागाध्यक्ष डॉ. रुचिरा नौटियाल ने कहा कि ऐसे शैक्षणिक आयोजन चिकित्सकों और रेजिडेंट्स को केवल जानकारी नहीं देते, बल्कि उन्हें चिकित्सा के विकसित होते स्वरूप के साथ कदम मिलाकर चलने का अवसर भी प्रदान करते हैं। उन्होंने संस्थान की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि हिम्स मातृ एवं भ्रूण स्वास्थ्य सेवाओं को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में लगातार कार्य कर रहा है।

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कार्यक्रम में विशेषज्ञ व्याख्यानों के साथ संवादात्मक सत्र भी आयोजित किए गए, जहाँ प्रतिभागियों ने व्यावहारिक चुनौतियों और साक्ष्य आधारित चिकित्सा पद्धतियों पर खुलकर चर्चा की। रेजिडेंट्स ने अपने शोध कार्य, क्लीनिकल अनुभव तथा पोस्टर प्रस्तुतियों के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान की नई संभावनाओं को भी सामने रखा।

इस अवसर पर प्रति कुलपति डॉ. ए.के. देवरारी, डीन हिम्स डॉ. ए. शरीफ, डॉ. रेनू धस्माना सहित अनेक चिकित्सक एवं शिक्षाविद मौजूद रहे।

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