उत्तराखंड

Nanital Highcourt: नैनीताल स्थित हाईकोर्ट की बिल्डिंग की कहानी है बड़ी रोचक, जानिए कैसा हुआ निर्माण

देहरादून। उत्तराखंड की पुष्कर सिंह धामी सरकार ने पहाड़ से एक और संस्थान को तराई में शिफ्ट करने का निर्णय ले लिया है। अब नैनीताल हाईकोर्ट हल्द्वानी में शिफ्ट होगा। लंबे समय से इसकी मांग चल रही थी। लेकिन अब कैबिनेट ने हाईकोर्ट को सैद्धांतिक स्वीकृत देते हुए इस प्रस्ताव मुहर लगा दी है। अब जल्द ही हल्द्वानी में उत्तराखंड के हाईकोर्ट का नया भवन तैयार होगा। सभी न्यायाधीश भी हल्द्वानी शिफ्ट होंगे। इसके साथ ही नैनीताल स्थित हाईकोर्ट की बिल्डिंग अब धरोहर बन जाएगी। लेकिन क्या आपको पता है कि नैनीताल में हाईकोर्ट जिस बिल्डिंग में संचालित होती है, उसके निर्माण और इसी बिल्डिंग में हाईकोर्ट संचालित करने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।

 

ऐतिहासिक भवन के निर्माण की कहानी ब्रिटिश काल से शुरु
बता दें कि वर्तमान हाईकोर्ट के इस भवन के निर्माण की कहानी ब्रिटिश काल में साल 1862 में शुरू होती है। उस समय उत्तर पश्चिमी प्रांत में भीषण गर्मी पड़ने के कारण अंग्रेजों को सरकारी काम निपटाने में दिक्कत होती थी। ऐेसे में उत्तर पश्चिमी प्रांत के लिए किसी ठंडे जगह पर ग्रीष्मकालीन राजधानी और वहां कामकाज के लिए सचिवालय निर्माण की जरूरत महसूस हुई तो फिर नैनीताल को चुना गया।

 

नैनीताल को बनाया गया तत्कालीन संयुक्त प्रांत की राजधानी
दरअसल 1815 में अंग्रेजों ने कुमाऊं और गढ़वाल को जोड़कर कुमाऊं कमिश्नरी की स्थापना की और उत्तराखंड के सभी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य नैनीताल से ही किये जाने लगा था। 1862 से नैनीताल को तत्कालीन संयुक्त प्रांत की राजधानी भी बना दिया गया। नैनीताल का इतिहास पर्यटन से अधिक न्यायिक और प्रशासनिक है इसलिए उत्तराखंड की स्थापना के समय ही नैनीताल मे उत्तराखंड की स्थाई हाईकोर्ट की स्थापना की गई। बता दें कि संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय का प्रावधान है।

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अंग्रेजों ने बनाया अपना सचिवालय

साल 1896 में अंग्रेजी सरकार ने नैनीताल के बांर्सडेल एस्टेट का अधिग्रहण कर लिया और अधिशासी अभियंता एफ. ओ ओरटेल की देखरेख में भवन का निर्माण शुरू कराया। इस तरह वर्ष 1900 में गौथिक शैली में यह भवन बनकर तैयार हो गया, जिसे अंग्रेजों ने अपना सचिवालय बनाया।

 

गौथिक शैली में कराया था निर्माण
नैनीताल के इतिहासकार और कुमाऊं विश्वविद्यालय के प्रो. अजय रावत के मुताबिक, अंग्रेजों ने अपने सचिवालय का निर्माण गौथिक शैली में कराया था। इस शैली की उत्पत्ति उत्तरी फ्रांस, इंग्लैंड और उत्तर इटली के लोंबार्डी में हुई थी। इस शैली में पत्थरों को इस तरह से तराशा जाता है कि उनकी लंबाई चौड़ाई और सतही संरचना एक प्रकार होती है।

 

भूकंपरोधी है यह भवन
यही नहीं इस निर्माण में जिस मसाले का इस्तेमाल किया गया, उसे उड़द की दाल, गुड़ और पत्थर के चूरे से तैयार किया गया था। इससे भवन में एक लचीलापन आ जाता है, जो इसे भूकंपरोधी बनाता है। नैनीताल का यह भवन इसी शैली का अद्भुत नमूना है। नैनीताल का राजभवन भी इसी शैली से बनाया गया

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नैनीताल को माना जा रहा था उत्तराखंड की राजधानी
जब उत्तर प्रदेश का विभाजन कर नया और अलग राज्य उत्तराखंड बनाया गया तो सचिवालय और राजभवन पहले से ही नैनीताल में होने के कारण इसे उत्तराखंड की राजधानी बनाना तय माना जा रहा था। लेकिन कुछ लोग इसके विरोध में उतर आए, जिसके बाद उत्तराखंड की राजधानी देहरादून बना दी गई।

 

जेटली ने की थी नैनीताल में हाईकोर्ट बनाने की घोषणा
देहरादून के प्रदेश की राजधानी बनने के बाद अब राज्य के लिए उच्च न्यायालय की बात उठी तो इसके लिए कुमाऊं के लोग एकजुट होने लगे। ऐसे में उस समय केंद्रीय कानून मंत्री रहे अरुण जेटली की बड़ी भूमिका सामने आई। अरुण जेटली का नैनीताल से पुराना और घनिष्ठ संबंध रहा है। साल 2000 में नैनीताल आकर जेटली ने ही हाईकोर्ट नैनीताल में ही बनाने की घोषणा कर दी। उस समय जेटली ने बचपन से ही नैनीताल के प्रति लगाव का जिक्र भी किया था।

 

कौन थे नैनीताल हाईकोर्ट के पहले जज
दरअसल कॉलेज के दिनों के अरुण जेटली के मित्र आईएएस अधिकारी विजय भूषण का घर नैनीताल में ही मल्लीताल में था। जेटली अक्सर उनके घर आया करते थे। 9 नवंबर 2000 को जब उत्तराखंड राज्य की स्थापना की गई तो इसके साथ ही नैनीताल में अंग्रेजों के बनाए सचिवालय भवन में हाईकोर्ट का भी उद्घाटन हुआ। 2000 में सृजन के समय स्वीकृत जजों की संख्या 7 थी, जिसे 2003 में बढ़ाकर 9 कर दिया गया। न्यायमूर्ति अशोक देसाई ने हाईकोर्ट का उद्घाटन किया था। वह यहां के पहले न्यायमूर्ति भी थे।

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लंबे समय से किया जा रहा था विचार
बता दें कि नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने को लेकर लंबे समय से विचार किया जा रहा था। हाईकोर्ट को नैनीताल से शिफ्ट करने के विरोध और पक्ष में अलग-अलग तर्क दिए जा रहे थे। यह विषय लगातार सरकार के समक्ष भी उठाया जा रहा था। आखिरकार सरकार ने इसे शिफ्ट करने का निर्णय ले लिया।

 

नैनीताल हाईकोर्ट पर जनता का हजारों करोड़ खर्च
नैनीताल में हाईकोर्ट होने की वजह से नैनीताल और उसके आसपास के गांवो के लगभग 10 हजार लोगों को रोजगार मिला हुआ है। लेकिन अब नैनीताल से हाईकोर्ट को हल्द्वानी शिफ्टिंग का फैसला लिया गया है। ऐसे में पहाड़ से हाईकोर्ट शिफ्टिंग के निर्णय के बाद नैनीताल हाईकोर्ट में भी वकीलों ने नाराजगी जाहिर की है। नैनीताल हाईकोर्ट को शिफ्ट करने के निर्णय पर वकीलों ने कहा कि नैनीताल से संस्थानों को शिफ्ट करना पहाड़ विरोधी निर्णय है।

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