पिता के वचन की लाज रखने वन चले रघुनंदन, राम-वियोग में सिसका अयोध्या का राजदरबार
देहरादून/डोईवाला। स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय, जौलीग्रांट के सेंट्रल पार्क में हिमालयन रिक्रिएशनल एंड वेलफेयर ट्रस्ट (एचआरडब्ल्यूटी) की ओर से आयोजित रामलीला महोत्सव के चौथे दिन मर्यादा, कर्तव्य और त्याग की मार्मिक प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कैकेयी-मंथरा संवाद से लेकर श्रीराम के वनगमन, सुमंत की विदाई और केवट लीला तक मंचित प्रसंगों ने रामकथा के भावनात्मक पक्ष को जीवंत कर दिया।
लीला का आरंभ अयोध्या के राजदरबार में श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारियों से हुआ। उत्सव के उल्लास के बीच मंथरा के षड्यंत्रपूर्ण संवाद ने घटनाक्रम को निर्णायक मोड़ दे दिया। उसके बहकावे में आकर कैकेयी ने कोपभवन का आश्रय लिया और राजा दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। भरत के लिए राजगद्दी और श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास सुनकर दशरथ धर्मसंकट में पड़ गए। एक ओर पुत्र के प्रति अगाध स्नेह था, तो दूसरी ओर दिए गए वचन की मर्यादा।
पिता के वचन की रक्षा को सर्वोपरि मानते हुए श्रीराम ने वनगमन स्वीकार किया। माता सीता और भाई लक्ष्मण का उनके साथ वन के लिए प्रस्थान करना त्याग, समर्पण और पारिवारिक निष्ठा का सशक्त संदेश दे गया। सुमंत के साथ विदाई का दृश्य दर्शकों के लिए विशेष रूप से भावुक रहा। जब सुमंत अयोध्या लौटे तो खाली रथ ने राजमहल के शोक और विरह को मानो साकार कर दिया।
इसके बाद गंगा तट पर केवट लीला का मंचन हुआ। केवट की सहज भक्ति और श्रीराम के चरण पखारने के प्रसंग ने भक्ति की उस परंपरा को रेखांकित किया, जिसमें आडंबर से अधिक महत्व प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का है।
रामलीला महोत्सव का अगला चरण 15 अक्टूबर को मंचित होगा। पांचवें दिन भरत-शत्रुघ्न आगमन, भरत मिलाप, शूर्पणखा नासिका छेदन, खर-दूषण वध और रावण दरबार के प्रसंग प्रस्तुत किए जाएंगे।

