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विवेक की सत्ता,नियमों का वनवास,,मुनिकीरेती नगर पालिका में टेंडर नहीं,‘मनोनयन प्रक्रिया’ चल रही है क्या?

टिहरी। लोकतंत्र की बुनियाद नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही पर टिकी होती है, लेकिन मुनिकीरेती नगर पालिका में हालात कुछ ऐसे हैं मानो नियम केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए बने हों और असली सत्ता “विवेकाधिकार” नामक अदृश्य ताज के पास हो। बीते एक वर्ष में महज दो टेंडर और दोनों ही बार सवालों का पहाड़—यह संयोग कम और सुनियोजित व्यवस्था अधिक प्रतीत होती है।

 

कांग्रेस का आरोप है कि नगर पालिका में टेंडर प्रक्रिया अब प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि पसंद–नापसंद का निजी मंच बन चुकी है। पार्किंग से जुड़े पहले टेंडर में जब तकनीकी समिति की संस्तुति पालिका अध्यक्ष की पसंद से मेल नहीं खा सकी, तो पूरी प्रक्रिया को ही निरस्त कर दिया गया। तर्क वही पुराना, सुविधाजनक और सर्वकालिक—“विवेक की शक्ति”। सवाल यह है कि यदि तकनीकी समिति की राय भी विवेक के आगे बौनी है, तो समिति का अस्तित्व आखिर किसलिए?

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जनवरी 2026 में खुले निर्माण कार्य के टेंडर ने इन शंकाओं को और गहराया। दो तकनीकी निविदादाताओं को योग्य मानने के बाद भी अंतिम फैसला कथित तौर पर पहले से तय नाम के पक्ष में गया। एक पूर्व सभासद की आपत्ति, नियमों की व्याख्या और सार्वजनिक हित—सब कुछ उस एक विवेक के सामने मौन खड़ा दिखा।

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इंडियन यूथ कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अंशुल रावत का कहना है कि नगर पालिका में परिवारवाद और चहेतों की नीति ने निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का गला घोंट दिया है। कांग्रेस चेतावनी दे रही है कि यदि पारदर्शिता बहाल नहीं हुई, तो यह मुद्दा केवल नगरपालिका की चौखट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक गलियारों तक गूंजेगा।

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उधर, पालिका प्रशासन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए सभी प्रक्रियाओं को नियमसम्मत बता रहा है। लेकिन सवाल अब नियमों का नहीं, विश्वास का है। क्योंकि जब हर निर्णय के पीछे बार-बार “विवेक” खड़ा नजर आए, तो जनता स्वाभाविक रूप से पूछती है—क्या मुनिकीरेती नगर पालिका में टेंडर खुलते हैं या केवल नामों पर से पर्दा उठाया जाता है?

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