उत्तराखंड

ज्योतिष:2 या 3 मार्च? ग्रहण की गुत्थी के बीच होली पर अंतिम फैसला,आचार्य दैवज्ञ ने खोला संशय का ताला 

देहरादून। जब पूरा जनमानस रंगों के महापर्व की तैयारी में डूबा हो और उसी बीच तिथियों को लेकर संशय का कुहासा फैल जाए, तब समाज की निगाहें परंपरा, शास्त्र और तर्क के संगम पर टिक जाती हैं। इस बार होली को लेकर 2 या 3 मार्च की उलझन ने लोगों को असमंजस में डाल दिया था। ऐसे में उत्तराखंड ज्योतिष जगत के प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ने अपने सुविचारित और शास्त्रसम्मत वक्तव्य से स्थिति को स्पष्ट कर दिया है।

 

 

आचार्य दैवज्ञ ने गंभीरता से कहा कि शास्त्रों में फाल्गुन पूर्णिमा की प्रदोष काल में भद्रा रहित समय में होलिका दहन का विधान है। इस वर्ष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 2 मार्च 2026 को प्रदोष काल में विद्यमान है, किंतु 3 मार्च को सायं 5:12 बजे सूर्यास्त से पूर्व ही समाप्त हो रही है। ऐसे में भद्रा के पुच्छ काल—रात्रि 1:27 से 2:39 बजे के बीच—होलिका दहन संभव है।

 

 

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 3 मार्च को प्रातः 5:30 बजे भद्रा समाप्ति के उपरांत सूर्योदय (6:44 बजे) से पहले 6:20 बजे तक होलिका दहन करना समाज के व्यापक हित में शास्त्रसम्मत रहेगा। यदि स्थानीय परिस्थितियां अनुकूल न हों, तो उदय व्यापिनी पूर्णिमा के आधार पर 3 मार्च को चंद्रग्रहण समाप्ति के पश्चात सायं 7:00 से 8:30 बजे के मध्य भी होलिका दहन किया जा सकता है।

 

 

–चंद्रग्रहण का संयोग: आस्था और विज्ञान का संगम

 

डॉ. घिल्डियाल ने बताया कि पूर्णिमा व्रत 2 मार्च को रखा जाएगा। भारत में दृश्य खग्रास ग्रस्तोदय चंद्रग्रहण का सूतक 3 मार्च प्रातः 6:20 बजे से आरंभ होगा, जबकि ग्रहण दोपहर 3:27 बजे से सायं 6:56 बजे तक दिखाई देगा। यह ग्रहण सिंह राशि और पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में घटित होगा—जो ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।

 

 

—धूलंडी 4 मार्च को

 

 

चंद्रग्रहण के कारण 3 मार्च को रंगोत्सव मनाना शास्त्रानुकूल नहीं होगा। अतः धूलंडी (छरौली) 4 मार्च को फाल्गुन प्रतिपदा में मनाना ही श्रेयस्कर रहेगा।

 

रंगों के इस महापर्व पर शुभकामनाएं देते हुए आचार्य दैवज्ञ ने समाज से संयम, सद्भाव और सजगता की अपील की है। उन्होंने कहा कि ग्रहों की परिवर्तित होती स्थिति के बीच उत्सव का आनंद लें, परंतु प्राकृतिक रंगों का प्रयोग करें, मन में दुराग्रह न रखें और भाईचारे की भावना से होली को सच्चे अर्थों में “रंगों का उत्सव” बनाएं।

 

 

असमंजस के इस दौर में शास्त्र, समय और तर्क का संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत कर आचार्य दैवज्ञ ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि जब परंपरा और विवेक साथ चलें, तभी उत्सव अपनी पूर्ण आभा में खिलता है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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