आचार्य दैवज्ञ का विश्लेषण — पृथ्वी लोक पर दिख सकते हैं खगोलीय सत्ता परिवर्तन के संकेत
देहरादून। ब्रह्मांडीय व्यवस्था और खगोलीय ऊर्जा संतुलन के बीच सौरमंडल में सत्ता परिवर्तन की औपचारिक प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। नवग्रहों, 27 नक्षत्रों और तारामंडल की भागीदारी से संचालित इस अद्वितीय खगोलीय लोकतांत्रिक प्रणाली में 23 फरवरी 2026 से आदर्श आचार संहिता प्रभावी हो गई है। नई सौर सरकार के गठन तक यह व्यवस्था लागू रहेगी।
खगोलीय घटनाओं के सूक्ष्म विश्लेषण के लिए प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डॉ. चंडी प्रसाद घिल्डियाल ‘दैवज्ञ’ के अनुसार, यह केवल प्रतीकात्मक आयोजन नहीं बल्कि ऊर्जा संतुलन और संवत्सर की दिशा निर्धारित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष सौरमंडल के मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में युवराज बुध को निष्पक्ष निर्वाचन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
ब्रह्म मुहूर्त में आयोजित उच्च खगोलीय परिषद की बैठक में नवग्रहों, नक्षत्रों और तारामंडल के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में 19 मार्च तक नई सौर सरकार के गठन का संकल्प पारित किया गया। इसी के साथ पूरे सौरमंडल में आचार संहिता लागू कर दी गई है, ताकि सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया पूर्णतः संतुलित और निष्पक्ष रहे।
आचार्य दैवज्ञ स्पष्ट करते हैं कि यह वार्षिक खगोलीय चुनाव केवल ग्रहों की स्थिति का पुनर्संयोजन नहीं, बल्कि आगामी संवत्सर की प्रकृति, पृथ्वी पर ऊर्जा प्रवाह, प्राकृतिक घटनाओं की तीव्रता और सामाजिक-राजनीतिक वातावरण तक को प्रभावित करने वाला निर्णायक कारक होता है। इसी आधार पर राजा, मंत्री और खगोलीय परिषद के अन्य पदों का चयन होता है, जो पृथ्वी लोक की संभावित परिस्थितियों का संकेत देता है।
उन्होंने चेतावनी स्वर में कहा कि आचार संहिता की अवधि के दौरान पृथ्वी पर अस्थिर ऊर्जा प्रवाह देखने को मिल सकता है, जिसके परिणामस्वरूप भूकंप, अग्निकांड या राजनीतिक अस्थिरता जैसी घटनाएँ घटित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
विशेष रूप से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों — उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ तथा रुद्रप्रयाग — में संवेदनशीलता अधिक रह सकती है।
आचार्य दैवज्ञ ने जनमानस से संयम, सतर्कता और आध्यात्मिक साधना को जीवन का हिस्सा बनाने का आग्रह किया है। उनके अनुसार, खगोलीय परिवर्तन केवल आकाशीय घटना नहीं, बल्कि चेतना और प्रकृति के गहरे संबंधों का दर्पण हैं।


