आरोप:जिसने सिखाया जंगल बचाना,उसी पर जंगल कब्जे के आरोप!आरक्षित वन भूमि प्रकरण ने बढ़ाई प्रशासन की बेचैनी
देहरादून। ‘हेस्को’ के संस्थापक पद्मभूषण डॉ. अनिल प्रकाश जोशी इन दिनों विवादों में घिरे हैं। डा. जोशी को पर्यावरण संरक्षण में विशिष्ठ योगदान देने के कारण उन्हें पद्म भूषण, पदम श्री सहित दर्जनों पुरस्कार पुणे मिल चुके हैं।
अब ऐसे में डॉ जोशी पर आरक्षित वन भूमि (खसरा नं॰384/1)पर अवैध तरीके से कब्जा करने और उस पर अवैध रूप से भवन निर्माण का संगीन आरोप लगा है।
राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी भी अनिल जोशी पर करवाई न होने की दशा में आंदोलन की तैयारी कर रही है।
राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी के पर्यावरण प्रकोष्ठ अध्यक्ष योगेश ईष्टवाल ने आरोपों को पुख्ता करने के लिए तकनीकी साक्ष्यों का सहारा लिया है। उन्होंने इसरो भवन और गूगल अर्थ की सैटेलाइट इमेजरी का हवाला देते हुए यह तर्क दिया है कि आरक्षित वन क्षेत्र में डॉ. जोशी द्वारा अवैध निर्माण और कब्जा किया गया है। इन डिजिटल सबूतों ने वन विभाग और प्रशासन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
यदि यह आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह न केवल एक व्यक्ति की साख पर बट्टा/सवाल होगा, बल्कि उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर देगा।
उत्तराखंड में वन भूमि अतिक्रमण एक ऐसा नासूर बन चुका है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि किसी भी कीमत पर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त किया जाए। ऐसे में डॉ जोशी पर लगे आरोपों ने सरकार और प्रशासन को धर्मसंकट में डाल दिया है। हालांकि अब तक पुलिस या वन विभाग की ओर से डॉ. जोशी के खिलाफ किसी बड़ी आधिकारिक कार्रवाई की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन क्या रुख अपनाता है।
प्रभागीय वनाधिकारी देहरादून ने एसडीएम विकास नगर को संयुक्त निरीक्षण का पत्र जारी किया था, किन्तु उक्त तिथि को राजस्व विभाग की टीम विवादित स्थल पर नहीं पहुँची।
जिसके बाद राष्ट्रवादी रीजनल पार्टी के पर्यावरण प्रकोष्ठ अध्यक्ष योगेश ईष्टवाल ने प्रमुख सचिव वन एवं पर्यावरण विभाग, प्रमुख सचिव राजस्व विभाग, प्रमुख मुख्य वन संरक्षक, प्रमुख वन संरक्षक शिवालिक क्षेत्र देहरादून, प्रभागीय वनाधिकारी, जिलाधिकारी देहरादून, उप जिला अधिकारी को संयुक्त रुप से लिखें पत्र में राजस्व विभाग की भूमिका को संदिग्ध बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीते 21 जनवरी प्रभागीय वनाधिकारी ने राजस्व विभाग और वनविभाग के सर्वेयर को उक्त विवादित वन भूमि की जांच करने के लिए आदेशित किया था। वन विभाग की टीम सर्वेयर के साथ मौके पर मौजूद रही, लेकिन राजस्व निरीक्षक और तहसील प्रशासन विकास नगर से कोई भी अधिकारी विवादित स्थल पर नहीं पहुंचा।
ईष्टवाल ने सरकार को दो टूक चेतावनी दी है कि सुप्रीम कोर्ट आदेशानुसार उक्त प्रकरण की निष्पक्ष जांच की जाए, अन्यथा पार्टी आंदोलन के लिए बाध्य होगी, जिसकी जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की रहेगी।


