उत्तराखंड

एम्स ऋषिकेश:जहाँ जीवन बचाने की शपथ तो है, वहाँ गंदगी का भी राज है,,तस्वीरें बोलती हैं जनाब

ऋषिकेश। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ऋषिकेश—नाम लेते ही देशभर के मरीजों की आँखों में उम्मीद चमकती है। यह वही संस्थान है जिसे चिकित्सा की उत्कृष्टता, अनुशासन और मानवीय गरिमा का प्रतीक माना जाता है।

लेकिन जब उसी संस्थान के शौचालयों में कदम रखा जाए, तो यह उम्मीद बदहवास होकर दम तोड़ती नजर आती है।
यह विडंबना ही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का आईना है कि जिस अस्पताल में संक्रमण से लड़ने का विज्ञान सिखाया जाता है, वहीं शौचालय खुद संक्रमण का स्थायी पता बन चुके हैं। फर्श पर जमा बदबूदार पानी, सड़ते दरवाजे, दीवारों पर थूक और पीक के निशान—ये दृश्य किसी उपेक्षित बस अड्डे के नहीं, बल्कि देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थान के हैं।

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यह सवाल स्वाभाविक है—क्या स्वच्छता अब चिकित्सा का हिस्सा नहीं रही?
या फिर करोड़ों के बजट और स्वच्छ भारत जैसे अभियानों की
चमक सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गई है?

 

नाम न छापने की शर्त पर एक तिमारदार बताते हैं कि सबसे ज्यादा पीड़ा उस मरीज को होती है जो दर्द से कराहता हुआ शौचालय तक पहुँचता है और वहाँ उसे न गोपनीयता मिलती है, न सुरक्षा। कई शौचालयों में कुंडी तक न होना यह बताता है कि व्यवस्था को शायद मरीज की गरिमा से कोई सरोकार नहीं। टूटी टोटियाँ और सूखी टंकियाँ यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या सफाई सिर्फ उद्घाटन समारोहों तक सिमट गई है।

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गौरतलब है कि एम्स कोई साधारण अस्पताल नहीं है। यह करदाताओं के पैसे से चलता है, जनता की आस्था से पनपता है और सरकार की नीतियों का चेहरा कहलाता है। ऐसे में शौचालयों की यह दुर्दशा केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जनता के विश्वास के साथ किया गया खिलवाड़ है।

प्रशासन यदि यह मानता है कि इलाज सिर्फ ऑपरेशन थिएटर तक सीमित है, तो यह सबसे बड़ी भूल है। स्वच्छता इलाज की पहली सीढ़ी होती है। जब वही सीढ़ी गंदगी से ढकी हो, तो स्वास्थ्य की इमारत कैसे खड़ी होगी?

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अब सवाल यह नहीं कि तस्वीरें वायरल क्यों हुईं।
सवाल यह है कि यह हालत बनने ही दी क्यों गई?
एम्स प्रबंधन को चाहिए कि वह इस मुद्दे को इज्जत का सवाल समझे, न कि सूचना प्रबंधन का। क्योंकि जनता सब देख रही है—और अब चुप नहीं है।

इस बाबत ज़ब एम्स के PRO विभाग मे सम्पर्क किया गया या किया जाता है तो. विभागीय अधिकारी या तो नंबर ब्लॉक कर देते हैं या फिर जबावदेही किसी और की बता कर फोन काल काट देते हैं। बहरहाल तस्वीरें बोलती हैं जनाब।

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