सोशल मीडिया परिवारों को भीतर से तोड़ रहा, राज्य महिला आयोग अध्यक्ष कुसुम कंडवाल का बड़ा सामाजिक अलर्ट
देहरादून। सोशल मीडिया की अंधी दौड़ अब परिवारों की जड़ों को खोखला कर रही है। उत्तराखंड राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल ने समाज के सामने खड़े इस गंभीर खतरे को लेकर स्पष्ट और सशक्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की चकाचौंध में नई पीढ़ी न केवल संस्कारों से दूर हो रही है, बल्कि पारिवारिक रिश्ते भी तेजी से कमजोर पड़ रहे हैं।
कुसुम कंडवाल ने कहा कि आयोग के संज्ञान में लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनमें सोशल मीडिया के माध्यम से अनजान लोगों से बढ़ता संपर्क महिलाओं और बेटियों को साइबर अपराध, भावनात्मक शोषण और अनैतिक रिश्तों की ओर धकेल रहा है। ‘डिजिटल फ्रेंडशिप’ के नाम पर बन रहे ये संबंध कई परिवारों को भीतर से तोड़ रहे हैं।
महिला आयोग अध्यक्ष ने साफ शब्दों में कहा कि आज बच्चे और युवा मोबाइल स्क्रीन की आभासी दुनिया में इस कदर उलझ चुके हैं कि माता-पिता, बुजुर्गों और परिवार के साथ संवाद लगभग समाप्त हो गया है। यही संवादहीनता संस्कारों से कटाव की सबसे बड़ी वजह बन रही है।
उन्होंने विशेष रूप से उन युवतियों की स्थिति पर चिंता जताई जो पढ़ाई या नौकरी के लिए घर से बाहर रह रही हैं। कुसुम कंडवाल के अनुसार, कई लड़कियां सोशल मीडिया के प्रभाव में बिना परिणामों को समझे ‘लिव-इन’ जैसे रिश्तों में बंध जाती हैं, जिनका अंत अक्सर मानसिक, सामाजिक और पारिवारिक त्रासदी में बदल जाता है।
अभिभावकों से अपील करते हुए आयोग अध्यक्ष ने कहा कि बच्चों पर केवल भरोसा ही नहीं, बल्कि संवाद और संवेदनशील निगरानी भी जरूरी है। माता-पिता यदि समय रहते बच्चों की संगत, आदतों और सोच को समझ लें तो कई बिगड़ते हालात रोके जा सकते हैं।
महिलाओं और बेटियों को संबोधित करते हुए कुसुम कंडवाल ने कहा,
“स्क्रीन की चमक से रिश्ते नहीं चमकते। रिश्तों की असली मजबूती अपनों के साथ समय, विश्वास और संवाद से बनती है।”
उन्होंने दो टूक कहा कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार और राज्य महिला आयोग पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं, लेकिन समाज और परिवार को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। तकनीक का उपयोग विकास के लिए हो, न कि रिश्तों के विनाश के लिए—यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


